औदीच्‍य ब्राहमण की विशेषता श्री स्‍थल प्रकाश से


  1.  सदाचारी पुरूष सर्वत्र निर्भय रहता है और सदाचरण से ही देवत्‍व और ऋषित्‍व प्राप्‍त हो सकता है ।
  2.   ब्राहमण के लिए जातति ,कुल,वेदाभ्‍यास आदि कारणीभूत नहीं हो सकते वरन आचार पालन ही बाहणत्‍व  का कारण है। 
  3. जो ब्राहमण विध्‍यावान,तपस्‍वी और अपने आचार का पवित्रता से पालर करता है वही श्रेष्‍ठ माना जाता है।
  4.  जो ब्राहमण  सत्‍य, संयम युक्‍त ध्‍यान करने वाला जितेन्द्रिय  होता है उसका केवल दर्शन ही पवित्र कर देता है।यदि उसकी संगति का लाभ हो जाय तो कहना ही क्‍या ।
  5.  ब्रहमदेव ने महान तप करके  वेद धर्म की रक्षा के लिए ब्राहमणों को उत्‍पन्‍न किया और उन्‍हे उत्‍तर दिशा में स्‍थापित किय  है ,अत. उन्‍हे मनुष्‍य नहीं देवता ही समझना चाहिए ।
  6.  पुराण एवं उपगीता आदि में उत्‍तर प्रदेश में रहने वाले आचारशील ब्राहमणों को श्रेष्‍ठ माना गया है।
  7.  अजएव दाक्षिणात्‍य और प्राच्‍य एवं पश्चिम के ब्राहमणों की अपेक्षा उदीच्‍य उत्‍तर दिशा के ब्राहमण सदाचारी श्रेष्‍ठ हैं ।
  8. उदीच्‍य ब्राहमण  सभी ऋषि और आचारवान हैं। यह बात वेदशास्‍त्र और पुराणों में वर्णन की गई है ।
  9.  उदीच्‍य ब्राहमण श्रोत्रिय एवं सदाचार परायण  तथा तप और स्‍वाध्‍याय में तल्‍लीन  अर्थात ब्रहमचिन्‍तन में  परायण रहते हैं ।
  10. पवित्र तीर्थ,वन,पर्वत,और नदी के तट पर ही प्राय उदीच्‍य ऋषिवास करते हैं। वे ग्रहस्‍थाश्रमी होने के साथ साथ  वेद धर्म का भी पाूर्णतया पालन करते हैं ।
  11. उत्‍तर प्रदेश में हनने वाले ऋषियों के पुत्र  पवित्र एवं सदैव कीर्तिमान तथा सत्‍यज्ञान में लीन रहने वाले      ब्राहमण हैं।
  12. उदीच्‍य ब्राहमणों ने राजा के दान का घोर विषतुल्‍य जानकार  आज तक कभी उसको स्‍वीकार नहीं किया।

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