'औदीच्‍य भास्‍कर''श्री शिवप्रकाश जी व्दिवेदी-"औदीच्य बंधु" पत्र ओर "अखिल भारतीय औदीच्य महासभा"के जन्मदाता '।


"औदीच्य बंधु" पत्र ओर "अखिल भारतीय औदीच्य महासभा"के जन्मदाता 'औदीच्‍य भास्‍कर'' औदीच्‍य रत्‍न श्री शिवप्रकाश जी व्दिवेदी का जन्म मथुरा के प्रसिद्ध औदीच्य रत्न ज्‍योतिष बाबा के कुल के श्री अमरलाल जी महाराज के सबसे छोटे एवं पंचम पुत्र के रूप में मार्गशीर्ष शुक्‍ला 4  संवत 1929 वि; में हुआ था। जन्मजात बोद्धिक क्षमता के चलते, पांच वर्ष की अवस्‍था में ही आपका विद्यारंभ संस्कार सम्पन्न कर दिया,  और यज्ञोपवित संस्‍कार  होने के पूर्व ही आपने हिन्‍दी संस्क़ृत की प्रारम्भिक परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी।
        संस्क़ृत के अतिरिक्‍त आपने उर्दू और अंग्रेजी का ज्ञान भी अर्जित किया। अपनी कुल विद्या ज्‍योतिष की शिक्षा आपने जयपुर के सुप्रसिद्ध श्री पं; गोकुलचन्‍द जी भावन से प्राप्त की। भावन जी इनकी विलक्षण प्रतिभा और मेधाशक्ति पर मुग्‍ध थे।
      अपने गुरू पूज्‍य परमहंस श्री क़ृष्‍णानंद जी सरस्‍वती महाराज [काशी] की क़ृपा से आप धर्मशास्‍त्र और संस्क़ृत साहित्‍य में भी पूर्ण पारंगत हो गये थे। आपने वेद, पुराण एवं कर्मकाण्‍डादि का भी अध्‍ययन किया।
        विद्यानुराग एवं धर्मरक्षा आपके जीवन के प्रथम उदेश्य रहे। इसी के अनुरूप आपने अपने भवन में ही ''डायमंड ज्‍युबली ज्‍योति विद्यालय'' खोला जो कई वर्षो तक ज्‍योतिष एवं संस्क़ृत के विद्यार्थियों का उपकार करता रहा।
     अध्‍ययन, अध्‍यापन और स्‍वाध्‍याय के अतिरिक्‍त आप अनेक ग्रन्‍थों की रचना भी की।

  1. ''ज्‍योतिष केदार'' [श्रीमान क़ृपाशंकर जी महाराज रचित] मुहुर्त भाग का भाष्‍य कर उसे प्रकाशित किया। 
  2.  दुर्गा सप्‍तशती का अनुवाद [दोहा चौपाई में] "शक्ति चरितामृत" के नाम से प्रकाशित किया, जिसकी सभी पत्रों एवं विव्‍दानों द्वारा मुक्‍तकंठ से प्रशंसा हुई। 
  3. "क्षेत्रदिवाकर" की रचना की । 
  4. "स्मृति प्रामाण्‍य परामर्श" नामक स्मृतिशास्‍त्र  की प्रामाणिकता पर संस्क़ृत में शोध-निबन्‍ध। 
  5. बालकोपयोगी संस्क़ृत लघुकाव्‍य "ध्रुव-धैर्य" का लेखन किया जो विव्‍दानों से प्रशं‍सित हुआ।
  6. ''पूतिपंचाशिका''  के नाम से संस्क़ृत के उत्तरोतर समस्‍याओं की पूर्ति का संग्रह किया जो अब अप्राप्‍य है।  
  7. ज्‍योतिर्मुकुल, ज्‍योतिष के विद्यार्थियों  के लिये प्रारंभिक ज्ञान कराने वाली अनमोल पुस्‍तक है। 
  8. अशोक दीपक, अशों या सूतक के संबंध में प्रामाणिक धर्मशास्‍त्रों से संग्रहित श्‍लोकबध्‍द ग्रंथ संपादन कर प्रकाशित किया।  
  9. 'सुक्ति मौक्तिक माला''  में संस्क़ृत के 108 श्‍लोक तथा भाषा के बौध्‍ाजन की नीति पद्यों का सुन्‍दर संग्रह है। 
  10. "दुखमय जीवन" में मनुष्‍य के जन्‍म से मरणोपरान्‍त के विविध दुखादि का वर्णन है। 
  11.  कवि मुकुद कौमुद  हिन्‍दी के उत्‍मोत्‍तर कवित्‍तों की रचना। 
  12. ज्‍योतिष केदार  की "द्रश्‍यवल्‍ली" नामक अंश निर्माण कर ज्‍योतिष विद्या के अपूर्ण ग्रन्‍थ  को सर्वांगपुर्ण बनाया । 
       इनके अतिरिक्‍त आपने सरस्‍वती, माधुरी, कल्‍याण आदि मासिक पत्रों में भी अनेक गवेषणापूर्ण एवं उपयोगी लेख प्रकाशित करवाये। मथुरा की विव्‍दत सभा एवं विव्‍दव्दिलास पुस्‍तकालय के आप प्रधान संचालक रहे। मथुरा से निकलने वाली 'सव्‍दर्म'  नाम संस्क़ृत मासिक पत्र के '' स्मृति  खण्‍ड के आप संपादक थे। 
   ज्‍योतिष यंत्रों का निर्माण -----आपने ज्‍योतिष संबंधी अनेक यंत्रों का स्‍वयं स्‍फूर्ति से निर्माण किया था। आपकी बनाई हुई ''सार्वदेशिक धूपघडी'' तथा लग्‍नबोधक घडी भी अदभूत रचना है। जो चाबी देने से बराबर चलती है और तिथि, वार, लग्‍नादि बतलाती है। गोलार्यन्‍त्र भी आश्‍चर्यजनक है, जो कि प्रयाग प्रदर्शनी में प्रदर्शित हुआ और उस पर निर्माता को स्‍वर्णपदक प्राप्‍त हुआ था। 
     संवत 1994 में आपने अपने शिवाश्रम नामक उद्यान में ज्‍योतिष की सुन्‍दर दर्शनीय यंत्र शाला बनवाकर उसमें अपने पुराने आविष्‍कारों के अतिरिक्‍त सभा, यंत्र वृहद गोलार्द, यष्टियंत्र, ध्रुवभित्ति, भूगोल, तुरीय, मर्कटी आदि नवीन यंत्र बनवाकर उन्‍हे यथा स्‍थान लगाये थे, जो एक अदभुत संग्रहालय बन गया। किन्‍तु उत्‍तराधिकारियों की अदूरदर्शिता  के फलस्‍वरूप यह स्‍थान दूसरों के हाथ में चला गया सब यंत्र लुप्‍त हो गये।     
       आप अच्‍छे कवि और कुशल चित्रकार भी थे। प्रतिवर्ष आश्विन मास में अपने यहां 'झांसी' (सूखे यंत्र की चित्रकारी) प्रदर्शित करते थे। जिसे देखकर यूरोपियन अधिकारी चमत्कृत होते और आपकी कला की कुशलता की प्रशंसा करते। सन 1911 में जब प्रिन्‍स आफ वेल्‍स (जार्ज पंचम) भारत आये थे, तब उन्‍हे भी यह झांकी प्रदर्शनी दिखाई गई थी । 
      आपको पर्याप्‍त राज्‍य सम्‍मान प्राप्‍त हुआ । कई वर्षो तक आप आनरेरी मजिस्‍टेट भी रहे । 
औदीच्‍य समाज की सेवार्थ महान प्रयास
     आपने अपने सतत प्रयास एवं तन मन धन से प्रयत्‍न कर अखिल भारतीय औदीच्‍य समाज के कई अधिवेशन करवा कर, बैठके बुलाकर एकता के सूत्र में आबध्‍द किया ।
औदीच्‍य पत्र पत्रिकाओं का संपादन
        प्रारंभ में औदीच्य समाज की ''गुर्जर पत्रिका'' के संपादन में सहयोग दिया।
        सन 1924/25  में करनाल पंजाब  से ''औदीच्‍य ब्राहमण '' नामक मासिक पत्र का प्रकाशन प्रारम्‍भ होने पर उसमें सहयोग दिया।
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इस पत्र में समस्त ब्राह्मण समाज के लिए उनका आकर्षण  देखने मिलता हे। 
     संवत 1984 से स्‍वयं ''औदीच्‍य बन्‍धु'' को प्रकाशन मथुरा से आरंभ किया और उसके संपादक बनकर सम्‍पूर्ण हानि की पूर्ति अपनी और से की। ततपश्‍चात पत्र को बराबर चलाने के लिए अपने सुयोग्‍य भ्रात्रज श्री चंद्र प्रकाश द्विवेदी ओर श्री पं; राधेश्‍याम व्दिवेदी को उसका सम्‍पूर्ण कार्य भार सौंप दिया। तब से आज तक अनेक प्रकार के उलट फेर देखने के बाद "औदीच्‍य बन्‍धु"  औदीच्‍य जाति और समाज की सेवा करता आ रहा है।
सेवा सम्‍मान
 जाति महासभा के कर्णधार होने के नाते आपको संवत 1985 में मथुरा में महासभा में ''औदीच्‍य भास्‍कर'' की उपाधि से सम्‍मानित किया। आप कई सम्‍मानित पदों पर रहे। सन 1911 के दिल्‍ली दरबार में भी आपको बुलवाकर सम्‍मानित किया गया। महायुध्‍द के समय भी आपको सहायता के सम्‍मान में एक घडी और राज्‍यनिष्‍ठा की स्‍मारक अनेक सनदें मिली जो आपके यहां मौजूद हैं। अंग्रेजी राज्‍य में आगरा के पास 'आकोला' एवं मथुरा के तटवर्ती  2/'3 ग्राम माफी में मिले थे।  स्‍व; महाराजा काशमीर, दरभंगा, बनारस , शाहपुरा  बुंदी आपसे अत्‍यन्‍त स्‍नेह रखते थे, और मथुरा आने पर आपसे अवश्‍य मिलते थे।
      आप अत्‍यंत सौम्‍य स्‍वभाव एवं उदारता, स्‍नेहमूर्ति तथा क्षमाशीलता के एक अव्दितीय आदर्श थे।  ज्‍येष्‍ठ क्रष्‍ण 9 गुरूवार संवत 1990में 61 वर्ष की अवस्‍था में आपका कैलाशवास हो गया।
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इसका कोई भी प्रकाशन समाज हित में किया जा रहा हे|सभी समाज जनों से सुझाव/सहायता की अपेक्षा हे|

1 टिप्पणी:

Ved Pramitdave ने कहा…

== वेवाहिक संबंध ==
सहस्र औदीच्य ब्राह्मण समाज में समान्यता परिचित ओर सीमित विवाह संबंध बनते रहे हें। वर्तमान में आवागमन के साधन सशक्त होने से इन सम्बन्धों का विस्तार हो गया हे। फिर भी अधिकतर मामलों में सहस्र औदीच्य ही आपस में पर अलग अलग गोत्रों में संबंध करते हें। ईस्वी सन 1500-1600 के काल में समाज की जन संख्या देड़ लाख 150000 के लगभग हो गई थी। इसी समय गुजरात के छिन्न भिन्न होने से केवल इन सो वर्षों में ही दस से पंद्रह समूह बन गए थे। उनमें आपसी संबद्ध रोटी-बेटी व्यवहार चलता रहा था।

इसी काल में [1500-1600 इसवीं सन में] गुजरात में दुर्भिक्ष ओर आततायी आक्रमणों के कारणो से गुजरात छोड़करकई समूहों में अन्य स्थानो जाने लगे थे, एक बड़े समूह में 1200 गाडियाँ उज्जैन आई।

यह किवदंती प्रचलित हे, की इन बारह सो के विभाग वाले लोग किसी सेना में जबरन भर्ती किए गए थे, अथवा कोई दासता स्वीकार की थी, ओर किसी युद्ध में भाग लिया था। इसी कारण कट्टर पंथियों ने उनसे दंड प्रायश्चित मांगा, नहीं देने पर सिद्धपुर से घोषणा हुई कि, इनसे संबंध न रखा जाए। चूंकि ये बारह सो की बड़ी संख्या में थे, जो अन्य समूहो से अधिक थी, इसी कारण इनका नाम करण "बड़ी संभा ' या समवाय पड़ा ओर अन्य "छोटी संभा" या समवाय कहलाने लगे। तब से अब तक कुछ कट्टर पंत्ती आपस में विवाह संबंध नहीं करते रहे हें।

वर्तमान में पुरानी पीड़ी को छोड़कर नई पीड़ी के लोग इस संभावाद से मुक्त होकर संबंध करने लगें हें। इसके अतिरिक्त वर्तमान में सभी औदीच्य ब्राह्मणो को अर्थात, सहस्र छोटी बड़ी दोनों संभा, टोलकीय, मारू, आदि आदि सभी औदीच्यों को एक किए जाने का प्रयास चल रहा हे। कुछ प्रगति वादियों का मानना यह भी हे की जब हा सब उदीच दिशा के नाम से औदीच्य कहलाए हें तो सभी उत्तर भारतीय औदीच्य हें, उनमें आपस में रोटी बेटी संबंध होना चाहिए। यह देखा भी जा रहा हे।
This massage I have read in ur Audichya Bandhu, now gujaart having all potentially thick Audichya sahastra brahman samaj in Big city,Ahmedabad,Surat,Rajkot,Valsad ,Sidhpur pl make ur publicity in next Audhya bandhu ,and send to mailing list of Gujarat ..probale our forward ideology in urban failies get chance for their son/daughter future.
Dr B N Dave
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Ahmedabad
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