'औदीच्‍य भास्‍कर''श्री शिवप्रकाश जी व्दिवेदी-"औदीच्य बंधु" पत्र ओर "अखिल भारतीय औदीच्य महासभा"के जन्मदाता '।


"औदीच्य बंधु" पत्र ओर "अखिल भारतीय औदीच्य महासभा"के जन्मदाता 'औदीच्‍य भास्‍कर'' औदीच्‍य रत्‍न श्री शिवप्रकाश जी व्दिवेदी का जन्म मथुरा के प्रसिद्ध औदीच्य रत्न ज्‍योतिष बाबा के कुल के श्री अमरलाल जी महाराज के सबसे छोटे एवं पंचम पुत्र के रूप में मार्गशीर्ष शुक्‍ला 4  संवत 1929 वि; में हुआ था। जन्मजात बोद्धिक क्षमता के चलते, पांच वर्ष की अवस्‍था में ही आपका विद्यारंभ संस्कार सम्पन्न कर दिया,  और यज्ञोपवित संस्‍कार  होने के पूर्व ही आपने हिन्‍दी संस्क़ृत की प्रारम्भिक परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी।
        संस्क़ृत के अतिरिक्‍त आपने उर्दू और अंग्रेजी का ज्ञान भी अर्जित किया। अपनी कुल विद्या ज्‍योतिष की शिक्षा आपने जयपुर के सुप्रसिद्ध श्री पं; गोकुलचन्‍द जी भावन से प्राप्त की। भावन जी इनकी विलक्षण प्रतिभा और मेधाशक्ति पर मुग्‍ध थे।
      अपने गुरू पूज्‍य परमहंस श्री क़ृष्‍णानंद जी सरस्‍वती महाराज [काशी] की क़ृपा से आप धर्मशास्‍त्र और संस्क़ृत साहित्‍य में भी पूर्ण पारंगत हो गये थे। आपने वेद, पुराण एवं कर्मकाण्‍डादि का भी अध्‍ययन किया।
        विद्यानुराग एवं धर्मरक्षा आपके जीवन के प्रथम उदेश्य रहे। इसी के अनुरूप आपने अपने भवन में ही ''डायमंड ज्‍युबली ज्‍योति विद्यालय'' खोला जो कई वर्षो तक ज्‍योतिष एवं संस्क़ृत के विद्यार्थियों का उपकार करता रहा।
     अध्‍ययन, अध्‍यापन और स्‍वाध्‍याय के अतिरिक्‍त आप अनेक ग्रन्‍थों की रचना भी की।

  1. ''ज्‍योतिष केदार'' [श्रीमान क़ृपाशंकर जी महाराज रचित] मुहुर्त भाग का भाष्‍य कर उसे प्रकाशित किया। 
  2.  दुर्गा सप्‍तशती का अनुवाद [दोहा चौपाई में] "शक्ति चरितामृत" के नाम से प्रकाशित किया, जिसकी सभी पत्रों एवं विव्‍दानों द्वारा मुक्‍तकंठ से प्रशंसा हुई। 
  3. "क्षेत्रदिवाकर" की रचना की । 
  4. "स्मृति प्रामाण्‍य परामर्श" नामक स्मृतिशास्‍त्र  की प्रामाणिकता पर संस्क़ृत में शोध-निबन्‍ध। 
  5. बालकोपयोगी संस्क़ृत लघुकाव्‍य "ध्रुव-धैर्य" का लेखन किया जो विव्‍दानों से प्रशं‍सित हुआ।
  6. ''पूतिपंचाशिका''  के नाम से संस्क़ृत के उत्तरोतर समस्‍याओं की पूर्ति का संग्रह किया जो अब अप्राप्‍य है।  
  7. ज्‍योतिर्मुकुल, ज्‍योतिष के विद्यार्थियों  के लिये प्रारंभिक ज्ञान कराने वाली अनमोल पुस्‍तक है। 
  8. अशोक दीपक, अशों या सूतक के संबंध में प्रामाणिक धर्मशास्‍त्रों से संग्रहित श्‍लोकबध्‍द ग्रंथ संपादन कर प्रकाशित किया।  
  9. 'सुक्ति मौक्तिक माला''  में संस्क़ृत के 108 श्‍लोक तथा भाषा के बौध्‍ाजन की नीति पद्यों का सुन्‍दर संग्रह है। 
  10. "दुखमय जीवन" में मनुष्‍य के जन्‍म से मरणोपरान्‍त के विविध दुखादि का वर्णन है। 
  11.  कवि मुकुद कौमुद  हिन्‍दी के उत्‍मोत्‍तर कवित्‍तों की रचना। 
  12. ज्‍योतिष केदार  की "द्रश्‍यवल्‍ली" नामक अंश निर्माण कर ज्‍योतिष विद्या के अपूर्ण ग्रन्‍थ  को सर्वांगपुर्ण बनाया । 
       इनके अतिरिक्‍त आपने सरस्‍वती, माधुरी, कल्‍याण आदि मासिक पत्रों में भी अनेक गवेषणापूर्ण एवं उपयोगी लेख प्रकाशित करवाये। मथुरा की विव्‍दत सभा एवं विव्‍दव्दिलास पुस्‍तकालय के आप प्रधान संचालक रहे। मथुरा से निकलने वाली 'सव्‍दर्म'  नाम संस्क़ृत मासिक पत्र के '' स्मृति  खण्‍ड के आप संपादक थे। 
   ज्‍योतिष यंत्रों का निर्माण -----आपने ज्‍योतिष संबंधी अनेक यंत्रों का स्‍वयं स्‍फूर्ति से निर्माण किया था। आपकी बनाई हुई ''सार्वदेशिक धूपघडी'' तथा लग्‍नबोधक घडी भी अदभूत रचना है। जो चाबी देने से बराबर चलती है और तिथि, वार, लग्‍नादि बतलाती है। गोलार्यन्‍त्र भी आश्‍चर्यजनक है, जो कि प्रयाग प्रदर्शनी में प्रदर्शित हुआ और उस पर निर्माता को स्‍वर्णपदक प्राप्‍त हुआ था। 
     संवत 1994 में आपने अपने शिवाश्रम नामक उद्यान में ज्‍योतिष की सुन्‍दर दर्शनीय यंत्र शाला बनवाकर उसमें अपने पुराने आविष्‍कारों के अतिरिक्‍त सभा, यंत्र वृहद गोलार्द, यष्टियंत्र, ध्रुवभित्ति, भूगोल, तुरीय, मर्कटी आदि नवीन यंत्र बनवाकर उन्‍हे यथा स्‍थान लगाये थे, जो एक अदभुत संग्रहालय बन गया। किन्‍तु उत्‍तराधिकारियों की अदूरदर्शिता  के फलस्‍वरूप यह स्‍थान दूसरों के हाथ में चला गया सब यंत्र लुप्‍त हो गये।     
       आप अच्‍छे कवि और कुशल चित्रकार भी थे। प्रतिवर्ष आश्विन मास में अपने यहां 'झांसी' (सूखे यंत्र की चित्रकारी) प्रदर्शित करते थे। जिसे देखकर यूरोपियन अधिकारी चमत्कृत होते और आपकी कला की कुशलता की प्रशंसा करते। सन 1911 में जब प्रिन्‍स आफ वेल्‍स (जार्ज पंचम) भारत आये थे, तब उन्‍हे भी यह झांकी प्रदर्शनी दिखाई गई थी । 
      आपको पर्याप्‍त राज्‍य सम्‍मान प्राप्‍त हुआ । कई वर्षो तक आप आनरेरी मजिस्‍टेट भी रहे । 
औदीच्‍य समाज की सेवार्थ महान प्रयास
     आपने अपने सतत प्रयास एवं तन मन धन से प्रयत्‍न कर अखिल भारतीय औदीच्‍य समाज के कई अधिवेशन करवा कर, बैठके बुलाकर एकता के सूत्र में आबध्‍द किया ।
औदीच्‍य पत्र पत्रिकाओं का संपादन
        प्रारंभ में औदीच्य समाज की ''गुर्जर पत्रिका'' के संपादन में सहयोग दिया।
        सन 1924/25  में करनाल पंजाब  से ''औदीच्‍य ब्राहमण '' नामक मासिक पत्र का प्रकाशन प्रारम्‍भ होने पर उसमें सहयोग दिया।
औदीच्य बंधु  की पूर्व पीठिका  ओर प्रथम औदीच्य बंधु अंक
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इस पत्र में समस्त ब्राह्मण समाज के लिए उनका आकर्षण  देखने मिलता हे। 
     संवत 1984 से स्‍वयं ''औदीच्‍य बन्‍धु'' को प्रकाशन मथुरा से आरंभ किया और उसके संपादक बनकर सम्‍पूर्ण हानि की पूर्ति अपनी और से की। ततपश्‍चात पत्र को बराबर चलाने के लिए अपने सुयोग्‍य भ्रात्रज श्री चंद्र प्रकाश द्विवेदी ओर श्री पं; राधेश्‍याम व्दिवेदी को उसका सम्‍पूर्ण कार्य भार सौंप दिया। तब से आज तक अनेक प्रकार के उलट फेर देखने के बाद "औदीच्‍य बन्‍धु"  औदीच्‍य जाति और समाज की सेवा करता आ रहा है।
सेवा सम्‍मान
 जाति महासभा के कर्णधार होने के नाते आपको संवत 1985 में मथुरा में महासभा में ''औदीच्‍य भास्‍कर'' की उपाधि से सम्‍मानित किया। आप कई सम्‍मानित पदों पर रहे। सन 1911 के दिल्‍ली दरबार में भी आपको बुलवाकर सम्‍मानित किया गया। महायुध्‍द के समय भी आपको सहायता के सम्‍मान में एक घडी और राज्‍यनिष्‍ठा की स्‍मारक अनेक सनदें मिली जो आपके यहां मौजूद हैं। अंग्रेजी राज्‍य में आगरा के पास 'आकोला' एवं मथुरा के तटवर्ती  2/'3 ग्राम माफी में मिले थे।  स्‍व; महाराजा काशमीर, दरभंगा, बनारस , शाहपुरा  बुंदी आपसे अत्‍यन्‍त स्‍नेह रखते थे, और मथुरा आने पर आपसे अवश्‍य मिलते थे।
      आप अत्‍यंत सौम्‍य स्‍वभाव एवं उदारता, स्‍नेहमूर्ति तथा क्षमाशीलता के एक अव्दितीय आदर्श थे।  ज्‍येष्‍ठ क्रष्‍ण 9 गुरूवार संवत 1990में 61 वर्ष की अवस्‍था में आपका कैलाशवास हो गया।
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रायबहादुर पण्डित चम्‍पालाल तिवारी।


औदीच्य समाज की विभूतियाँ- रायबहादुर पण्डित चम्‍पालाल तिवारी। 
भारतीय राजनीति व शासन व्‍यवस्‍था में चाणक्‍य व्‍दारा प्रतिपादित कूटनीति का आभास प्रत्‍येक युग में परि‍लक्षित हुआ है। साम, दाम, दण्‍ड, भेद के रहस्‍य को जिसने जान लिया उसे अपने जीवन काल में कभी मात नहीं खानी पडी। 
     यहां जिस व्‍यक्तित्‍व का विवरण संक्षेप में दिया जा रहा है, उसमें उक्‍त गुण भरपुर थे।  काकोरी काण्‍ड के प्रमुख स्‍वतन्‍त्रता संग्राम सेनानी रामप्रसाद बिस्मिल व उनके अन्‍य सहयोगी लखनऊ जेल में थे, उस समय राय बहादुर पं; चम्‍पालाल तिवारी तब उस लखनऊ जेल के वरिष्‍ठतम अधिकारी थे। अंग्रेजी शासन काल था, और उन्‍ही के बनाये कानून के तहत राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी की सजा सुनाई गई थी। अपने गुणो के कारण शासन को नाराज किए विना कुशलता पूर्वक, निर्देशों के विरुद्ध जाकर स्वतन्त्रता सेनानियों को अधिकतम सुख सुविधाये दीं। इससे वे उनके मुरीद बन गए थे। 
     सहयोगियों के सहयोग से बिस्मिल ने फांसी के पूर्व जेल से फरार होने की योजना बनाई। एक रात्रि बिस्मिल ने अपने तरु के रोशनदान की छडे काट डाली और जब वे उसमें से कूदने के लिए तैयार भर थे, उन्‍होने अपने संस्‍मरणों में लिखा है ''और मुझे उस समय साधू स्‍वभाव जेलर का ध्‍यान आया। बिस्मिल तू तो भाग जायेगा, उस जेलर के साथ क्‍या गुजरेगी"। ख्‍याल आते ही मैंने भागने का विचार छोड दिया, और नीचे कूद पडा । विस्मिल जी ने भी इस बारे मेँ ओर अधिक लिखित प्रमाण नहीं छोड़ा, क्योकि वे जानते थे, की वह तिवारी जी के विरुद्ध हो जायेगा। '' यह वाकिया सोचने को विवश करता है कि क्‍या खासियत थी श्री तिवारी के चरित्र में कि बिस्मिल ने फांसी के फन्‍दे पर झूलना मंजूर किया पर जेलर की नौकरी पर आंच न आने दी। [कहा जाता हे, की जेल की विस्मिल जी को छड़ काटने की सामग्री उनके इशारे पर ही उपलब्ध कराई गई थी। इस घटना के बाद विस्मिल जी को गोरखपुर जेल मेँ स्थानातरित किया गया था, ओर उन्हे वहीं फांसी हुई थी।] 
  लखनऊ जेल में कांकोरी के अभियुक्‍तों को बडी भारी आजादी थी। रायसाहब पं; चम्‍पालाल जेलर की कृपा से हम यह कभी नहीं समझ सके कि जेल में हैं, या किसी रिश्‍तेदार के यहां मेहमानी प्राप्‍त कर रहे हैं [विस्मिल]। हम लोग जेल वालों से बात बात में ऐंठ जाया करते थे। पं; चम्‍पालाल जी हम लोगों से अपनी संतान से भी अधिक प्रेम रखते थे। हम में से किसी को जरा सा भी कष्‍ट होता था तो उनको बडा दुख होता था। हमारे तनिक से भी कष्‍ट को वो नहीं देख सकते थे। 
     विस्मिल जी सहित सभी क्रांतिकारियों के लिखे गीत, कवितायें, लेख आदि, उनके कारण ही नियम विरुद्ध बाहर पहुँच कर प्रकाशित हो सकीं थीं, जिससे आजादी की लड़ाई के लिए जनता को नई दिशा दी। 
           श्री तिवारी ने  न सिर्फ बिस्मिल को अन्‍य स्‍वतन्‍त्रता सेनानियों को भी जेल में घर जैसा वातावरण सुलभ कराया। श्री तिवारी की धर्मपत्‍नी स्‍वयं अपने हाथों से ऐसे सेनानियों को मन पसन्‍द भोजन बना कर भिजवाती रही। 
    तत्‍कालीन कांग्रेसी नेता श्री चन्‍द्रभानु गुप्‍त इन्‍हीं कारणों से श्री तिवारी के अभिन्‍न रहे। आलम यह कि अंग्रेज सरकार भी उनकी प्रशासनिक क्षमता और कार्य कुशलता की इतनी कायल रही कि उन्‍हें रायबहादूर के खिताब से नवाजा। 
     इस विलक्षण व्‍यक्तित्‍व ने अंग्रेजों की दुर्नीति के विरुद्ध चतुराई ओर कूटनीति से जितने साल सरकारी सेवा की उससे अधिक समय तक पेंशन भी पाई। बुढापे में भी उनकी दबंग आवाज और भरे पूरे परिवार की दैनिक व्‍यवस्‍था ऐसे संभाली कि आज भी संयुक्‍त परिवार को मिसाल के रूप में याद किया जाता है।
     स्‍व; श्री शंभूराम जी तिवारी के ज्‍येष्‍ठ पुत्र श्री चम्‍पालाल तिवारी सेवा निव्रति के बाद जयपुर आगये थे।  जहां उनके ज्‍येष्‍ठ पुत्र स्‍व; श्री प्‍यारेलाल तिवारी वेदपाठी ने अपनी दूरदर्शिता और भविष्‍य की संभावनाओं को द्रष्टिगत रखते हुए आधार भूमि तैयार कर रखी थी। इनके पांच पुत्र सर्व श्री प्‍यारेलाल, देवीशंकर, रमाशंकर, कृपाशंकर, रूपशंकर व एक पुत्री सिध्‍देश्‍वरी देवी हुई। श्री देवीशंकर तिवारी ने राजस्‍थान में जो ख्‍याति अर्जित की वह बेमिसाल है। घर आये अतिथियों का मान सम्‍मान करना उनकी हाबी रही। आगत के सत्‍कार में कमी रहना उन्‍हे बर्दाश्‍त नहीं था । 
    औदीच्‍य समाज में जिन विभूतियों ने यश और ख्‍याति अर्जित कर समाज के गौरव को बढाया उनमें श्री तिवारी का स्‍थान विशिष्‍ट रहा। औदीच्‍य जाति का यह पुरोधा तो उल्‍लेखनीय है ही, कुदरत की मेहरबानी देखिए कि इसी कुल में वेद मर्मज्ञ, आदर्शवादी राजनेता, कुशल प्रशासक, तकनीकी विशेषज्ञ पैदा हुए जिन्‍होने इनकी वंश बेल की मात्र वृध्दि ही नहीं की अपितु उसमें चार चांद लगाए।
        इस प्रकार के सहृदय ओर साहसी कूटनीतिज्ञ व्यक्तित्व औदीच्य ब्राह्मण समाज के व्यक्ति मेँ ही हो सकती हे। हमें उन पर गर्व हे। 
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औदीच्‍य रत्‍न पं॰ मुकुन्‍दराम जी त्रिवेदी---औदीच्‍य समाज के गौरव

इन्‍दौर नगर के प्रथम आनरेरी मजिस्‍ट्रेट 
औदीच्‍य रत्‍न पं॰ मुकुन्‍दराम जी त्रिवेदी
 श्रध्‍देय प॰ मुकुन्‍दराम जी त्रिवेदी सा; का जन्‍म सऩ 1862 में अहिल्‍या नगरी इन्‍दौर में हुआ। आपके पूज्‍य पिता श्री पं; भवानीशंकरजी त्रिवेदी सा; जहां इन्‍दौर के सेठ साहूकारों के आराध्‍य थे, वहीं इन्‍दौर के राजघराने में आदर सम्‍मान से पूजे जाते थें। आपको इन्‍दौर के औदीच्‍य समाज की ओर से "जाति में सरदार"  की पदवी से विभूषित किया गया था। तब जाति के समस्‍त सामूहिक कार्यों के लिए सरदार की परवानगी आवश्‍यक हुआ करती थी। [उज्‍जैन नगर औदीच्‍य समाज में भी मान्‍य 4 सरदार परिवारों में यह परिवार था।]
   सन 1916 में स्‍व; श्री पं; जी राष्ट्र पिता महात्‍मा गांधी के निकट संपर्क में आये। वे मध्‍य भारत हिंदी साहित्‍य समिति के संस्‍थापक सदस्‍य थे। हिन्‍दी साहित्‍य का अष्‍टम अखिल भारतीय सम्‍मेलन इन्‍दौर में महात्‍मा गांधी के सभापतित्‍व में संयोजित किया गया था। पंडित जी की विशेष प्रतिभा और सुचारू व्‍यवस्‍था के तहत यह सम्‍मेलन बडी सफलता पूर्वक सम्‍पन्‍न हुआ। तभी से पंडित  जी महात्‍मा गांधी  के क़ृपा पात्र बने। इस आयोजन के दौरान गांधी जी पंडित जी के निवास स्‍थान पर पधारे  और इन्‍दौर के गणमान्‍य लोगों को बापू से बातचीत का अवसर मिला।
         सन 1921 में महात्‍मा गांधी के विदेशी कपडों के बहिष्‍कार का आंदोलन इन्‍दौर में पंडित जी ने संचालित किया। वे स्वयं भी तब तक मानचेस्‍टर की मीलों के उत्क़ृष्ठ वस्‍त्र धारण किया करते थे, उनका परित्‍याग किया और जीवन पर्यन्‍त स्‍वदेशी वस्‍तुओं का इस्‍तेमाल किया। उन्‍होने अपने पुत्रों और कुटुम्‍ब को भी स्‍वदेशी वस्‍तुओं उपयोग करने हेतु प्रोत्‍साहित किया।   महाराज होल्‍कर पंडित जी की सुझ-बुझ भरी विचार शैली, और उनकी प्रतिभा से परिचित तथा प्रभावित थे। उन्‍होने पहली बार इन्‍दौर नगर में आनरेरी मजिस्‍ट्रेट का पद कायम किया और पंडित जी को पदस्‍थ किया। पंडित जी सन 1915 से 1933 तक यशस्‍वी न्‍यायदाता का दायित्‍व निभाते हुए बडे लोकप्रिय साबित हुए।
        संगीत और ज्‍योतिष में खासा दखल था। सन 1936 में पंडित जी के प्रयत्‍न स्‍वरूप ही इन्‍दौर में अखिल भारती ज्‍योतिष सम्‍मेलन का आयोजन हुआ। महामना पं; मदनमोहन मालवीय ने इस सम्‍मेलन की अध्‍यक्षता की थी। पं; मालवीय जी  भी पं; मुकुन्‍दराम जी से प्रभावित होकर उनके निवास स्‍थान पर पधारे और उनके कुल को गौरवान्वित किया। पण्डित जी लोक कल्‍याण करते हुये जाति के उत्‍थान का भी सतत प्रयत्‍न करते रहे।  इन्‍दौर में पढाई के निमित्‍त ज्ञाति के विधार्थियों के लिए निवास की असुविधा पंडित जी के लिए एक चुभन बन गई थी। इसके निवारणार्थ एक औदीच्‍य  छात्रावास  का औचित्‍य पंण्डित जी खूब समझते थे। परिणाम स्‍वरूप ' मुकुन्‍दराम त्रिवेदी औदीच्‍य छात्रावास' अपने जनक श्री पंण्डित जी की याद प्रत्‍यक्ष रूप से संजोए हुए है।
       मालवा में अखिल भारतीय महासभा का दूसरा सफल  अधिवेशन  बडनगर में हुआ और पंडित मुकुन्‍दराम जी सा; त्रिवेदी को वहां पर महासभा का अध्‍यक्ष मनोनित किया गया। श्री त्रिवेदी जी के नेतृत्‍व में महासभा के कार्य का पर्याप्‍त विस्‍तार हुआ ।
           पंडित जी 17 जून 1972 को 110 वर्ष की आयु में ब्रहमलीन हो गये। दिवंगत होने के कुछ दिनों तक पूर्व वे प्रतिदिन  4 बजे उठते थे। पूजापाठ पश्‍चात  अपने कक्ष व वस्‍त्रों की सफाई स्‍वयं अपने हाथों से करते थे। पंडित का उसूल था ''आपदाओं में मूस्‍कराते हूए संघर्ष करो '' ।
                इन्‍दौर के प्रतिष्ठित अखबार ने एक बार पंडित जी से इंटरव्‍यू करते हुए उनके दीर्घायु होने का  रहस्‍य पूछा, तो पंडित जी ने अपनी चिर परिचित शैली में कहा--
"हुजूमें गम  मे भी मैं अपनी फितरतें भूला नहीं सकता ।
 मैं क्‍या करूं मेरी आदत है मुस्‍कराने की ।   ''
पंडित जी एक सच्चे औदीच्‍य रत्‍न थे । 
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Audichya Bandhu: वीडियो

Audichya Bandhu: वीडियो:
औदीच्य समाज के विशिष्ट व्यक्तियों के व्यक्तित्व ओर क़ृतित्व के दर्शन कराते चुनिन्दा विडिओ। आपकी जानकारी में भी एसे वीडियो हों तो क़ृपया अवगत कराएं/शेयर करें । 
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कोटा 9/03/2013-- अ; भा; औदीच्‍य महासभा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक सम्‍पन्‍न।

 अ; भा; औदीच्‍य महासभा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक सम्‍पन्‍न।
 प्रस्तुत कर्ता- उद्धव जोशी
दिनांक 9/3/2013 शनिवार, आयोजन, अ;भा; औदीच्‍य महासभा की राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी एवं राजस्‍थान प्रदेश प्रान्‍तीय कार्यकारिणी की बैठक। 
आयोजन स्‍थल-  सहस्‍त्र औदीच्‍य नानी सम्‍वाय श्री लक्ष्‍मीकान्‍त मन्दिर बैराज रोड, टिपटा, कोटा, 
आयोजक अ;भा; औदीच्‍य महासभा राजस्‍थान प्रान्‍त एवं कोटा सभाग। 

प्रांगण् में प्रवेश करते ही आत्‍मीयता के साथ् अतिथियों का कुकंम तिलक लगाकर नाम पंजीयन के साथ एक हेण्‍ड बेग एवं डायरी सभी आगन्‍तुक अतिथियों को प्रदान की गई । 

श्री वृजवल्‍लभ शर्मा, अध्‍यक्ष अ;भा; औदीच्‍य महासभा कोटा संभाग ने निर्धारित समय प्रात: 11 बजे अपनी सशक्‍त, ओजपूर्ण शैली एवं श्री गोविन्‍द माधव भगवान के जयकारे के साथ बैठक प्रारम्‍भ् करने की घोषणा कर सर्वप्रथम अतिथि गण श्री रघुनंदन जी शर्मा, राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष् ,अ;भा; औदीच्‍य महासभा एवं सांसद राज्‍य सभा, श्री हरिकुमार औदीच्‍य, पूर्व शिक्षा मंत्री राजस्थान प्रान्‍त, श्री उदयसिंह जी पण्‍डया, वरिष्‍ठ उपाध्‍यक्ष अ;भा; औ; महासभा, श्री हेमशंकर दीक्षित, अध्‍यक्ष राजस्‍थान प्रदेश इकाई, श्री मोहन दवे, अध्‍यक्ष्  महाराष्‍ट्र प्रदेश इकाई, श्री हीरालाल जी त्रिवेदी, सेवा निव्रत्त राजस्‍व आयुक्‍त म;प्र; शासन, श्री भगवानसिंह शर्मा, संगठन मंत्री, अ;भा; औदीच्‍य महासभा, श्री विनोदचन्‍द्र व्‍यास महामंत्री, श्री लक्ष्‍मीनारायण व्दिवेदी बांसवाडा, श्री रमेश पण्‍डया, से॰नि॰ एडीशनल कलेक्‍टर म;प्र; शासन, श्री सुभाष शर्मा, अध्‍यक्ष नगर निगम देवास को ससम्‍मान मंचासीन कराया। अतिथियों व्‍दारा श्री गोविन्‍द माधव के चित्र का पूजन एवं माल्‍यार्पण कर दीप प्रज्‍जवलित किया। परम्‍परानुसार सभी अतिथियों का पुष्‍पहार पहना कर भावभीना स्‍वागत किया। श्री हेमशंकर जी दीक्षित ने 'स्‍वागत उदबोधन' दिया । 
   इसके पश्‍चात श्री भगवानसिंह जी शर्मा, ने राष्ट्रीय  कार्यकारिणी की बैठक प्रारम्‍भ् करते हुऐ राजस्‍थान प्रदेश र्इकाई को धन्‍यवाद ज्ञापित किया। श्री उद्धव जोशी, उज्‍जैन ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की  गत बैठक की विवरणी का वाचन किया जिसकी पुष्‍टी की गई। 
   विषय सूचि के क्रमानुसार डॉ श्री मधु सूदन जी व्‍यास, उपाध्‍यक्ष म;प्र; इकाई ने,[श्री प्रकाश दुबे, अध्‍यक्ष् अ;भा; औ; महासभा मध्‍यप्रदेश् इकाई का स्‍वास्‍थ्‍य ठीक नहीं होने के कारण उनकी अनुपस्थिति में] प्रत्‍येक जिले में हुवे सदस्‍यता अभियान की विस्‍त्रत जानकारी देते हुए संकलित राशि का विवरण प्रस्‍तुत किया। आपने बताया की सबसे अधिक सदस्‍य उज्‍जैन जिला ग्रामीण् के अध्‍यक्ष श्री सत्‍यनारायण जी त्रिवेदी ने बनाये जो उनकी साधना और कार्यकुशलता का प्रतीक है। साथ जिलों में की गई बैठकों तथा आयोजनों के बारे में बताते हुए आगामी योजना पर भी प्रकाश डाला। आपने औदीच्‍य बन्‍धु वेबसाईड की जानकारी देते हुवे समाज के सदस्‍यों से आग्रह किया कि वे अपने अपने प्रान्‍त में होने वाली बैठको, आयोजन, धर्मशालाओं, प्रतिभाओं एवं अविवाहित युवा युवतियों की अध्यतन जानकारी लगातार भेजते रहें,  ताकि बेव साईड के माध्‍यम से समाज उसका लाभ ले सके।
     श्री मोहन दवे, अध्‍यक्ष्‍, अ;भा; औदीच्‍य महासभा महाराष्‍ट्र इकाई ने अपनी प्रगति रिपोर्ट प्रस्‍तुत करते हुए कहा महाराष्‍ट्र इकाई का गठन अप्रेल 2012 में होकर अभी बाल्‍यावस्‍था में है। मुम्‍बई शहर व्‍यवसाय से जुडा हुवा है। इसके उपरान्‍त भी हमने मेधावी छात्रों का सम्‍मान, विधवा महिला को आर्थिक सहयोग, 3 वेद पाठशालाओं से जुडते हुवे समाज के युवकों को वेदाध्‍ययन के लिये प्रेरित करना, परिचय सम्‍मेलन तथा सामूहिक विवाह आयोजित करने वाली समाज की संस्‍थाओं के साथ् सहयोग करने तथा सदस्‍यता अभियान को भी गति दी जा रही है। अप्रेल 2013 में स्‍थापना दिवस मनाये जाने पर विचार किया जा रहा है। मुम्‍बई का आदमी अपने को कास्‍ट से नहीं क्लास से जोडता है। आपने उपस्थित सदस्‍यों से कहा कि उनके जो भी रिश्‍तेदार आदि मुम्‍बई में हो उनकी जानकारी हम तक पहुंचाये ताकि उनसे सम्‍पर्क कर सके।  
  श्री हेमशंकर जी दीक्षित, अध्‍यक्ष राजस्‍थान इकाई ने अपने उदबोधन में कहा कि महासभा की राजस्‍थान इकाई को अभी ढाई वर्ष का ही समय हुआ है। 36 जिलों में से 24 जिलों में महासभा का गठन कर सदस्‍यता अभियान जोर शोर से चलाया जा रहा है। सामूहिक आयोजनों को बढावा देने के साथ ही साथ सामूहिक यज्ञोपवित संस्‍कार कराये गये हैं। युवाओं को केरियर गाईडेन्‍स की व्‍यवस्‍था के साथ क्रेडिट काआपरेटिव सोसायटी बनाई गई जिससे आर्थिक लाभ् समाज को हो सके। 
   श्री उदयसिंह जी पण्‍डया ने अपने उदबोधन में कहा कि महासभा के सदस्‍यता अभियान के साथ निरन्‍तर सार्थक स्‍वरूप की बैठके करने से संगठन में मजबुती आती है। समाज के स्‍कूल, बैंक आदि होना चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र को विकसित करने के लिये हर जगह अधिक से अधिक समाज के स्‍कूल खोलना होगा। इसी प्रकार बैंक एवं सहकारी सोसायटी भी हर जिला इकाई को खोलना चाहिए जिससे समाज को नई उर्जा मिल सकेगी। अध्‍यक्ष महोदय ने महासभा का जो विकेन्‍द्रीकरण् किया वह प्रशंसनीय है। 
   श्री हीरालाल जी त्रिवेदी ने कहा कि सामाजिक संगठन मजबूत हो। श्री शर्माजी के नेतृत्‍व में समाज के संगठन की पहचान हुई है, जो बधाई के पात्र हैं। हमारे संविधान में, जितने भी सुझाव दिये गये हैं उन सभी का समावेश है। संजीवनी कोष में अधिक से अधिक राशि एकत्रित होना चा‍हिए ताकि गंभीर बीमारी से पीडित व्‍यक्ति को यथा समय सहयोग मिल सके । राजस्‍व के संबंध में मैंने काफी अध्‍ययन किया है । पहले के समय में चौथ् वसूल होती थी। आज भी कर वसूल किया जाता है किन्‍तु पहले की अपेक्षा बहुत कम है। बच्‍चों के शैक्षणिक,शारीरिक विकास के लिए फण्‍ड होना चाहिए। वेदों में ब्राहमणों लिए जो निर्देश दिए गये हैं उसका पालन हमें करना चाहिए। छात्रावास का निर्माण तथा कोआपरेटिव सोसायटी का गठन आदि स्‍थानीय स्‍तर पर ही करना चाहिए। उत्‍तर प्रदेश में समाज का संगठन शीघ्र बनाया जावेगा। यदि समाज हित के कोई प्रश्‍न होगें तो उनका राष्ट्रीय स्‍तर पर निराकरण करेगें ।  
 अध्‍यक्ष् महोदय ने उपस्थित सदस्‍यों से सुझाव, ओर  प्रश्‍न आमंत्रित  किये ।
 उपस्थित सदस्‍यों व्‍दारा दिये गये सुझाव --निम्नानुसार हें। 
  •  मृदुला औदीच्‍य कोटा--- बालिकाओं की शिक्षा के लिऐ महासभा में फण्‍ड की व्‍यवस्‍था होना चाहिए ।
  • श्री रेवाशंकर जोशी उज्‍जैन --कोआपरेटिव सोसायटीयों का जिले वार गठन कर उसमें राशि डाली जावे ताकि युवाओं को रोजगार मिलेगा । 
  • श्री सत्‍यनारायण् जी कोटा - औदीच्‍य बन्‍धु के मप्र,राजस्‍थान, गुजरात, महाराष्ट्र आदि प्रान्‍तों के अलग अलग परिशिष्‍ट निकाले जावें ताकि समाज के सदस्‍यों की रूचि के साथ सदस्‍य संख्‍या में वृध्दि हो सके ।  आपने यह बताया की सरकार व्‍दारा अन्य जाति में विवाह करने पर युवक युवतियों को प्रोत्‍साहन राशि 5 लाख् देने की घोषणा की गई है, इसका समाज पर विपरीत असर पडेगा। महासभा व्‍दारा इसका पुरजोर विरोध् किया जाना चाहिए। यहां परिषद भवन का निर्माण् किया जा रहा है। इसके लिए महासभा  भी सहयोग करे।
  • उर्मिला शर्मा कोटा - मातृशक्ति समाज हित के कार्यो को करने के लिये सदैव तैयार है। औदीच्‍य बन्‍धु पत्रिका के अधिक से अधिक सदस्‍य बनाने का प्रयास किया जावेगा । 
  • रमेश जोशी कोटा-औदीच्‍य समाज के आचार विचार शुध्‍द हों इसके लिए सभी को प्‍याज लहसुन का उपयोग करना छोडना चाहिए।  
  • गोपीवल्‍लभ् तिवाडी जयपुर - मथुरा में समाज की एक धर्मशाला होकर पर्याप्‍त बर्तन आदि भी है किन्‍तु वहां दबंग लोगों ने कब्‍जा कर लिया है। राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी से निवेदन है, कि वह इस पर उचित कार्यवाही करे। उत्‍तर प्रदेश् में महासभा, समाज का संगठन बनावे। बांसवाडा में हुई तीन बच्‍चों की हत्‍या की चर्चा भी की गई। संजीवनी कोष् की व्‍यवस्‍था प्रत्‍येक जिलास्‍तर पर होना चाहिए ताकि तत्‍काल संबंधितों को सहायता दी जा सके। औदीच्‍य बन्‍धु का शुल्‍क न्‍यूनतम रखा जावे ताकि अधिक से अधिक सदस्‍य बन सके, क्योकि यह व्‍यावसायिक पत्र नहीं है । 
  • दातारशंकर शर्मा उदयपुर- औदीच्‍य बन्‍धु की सदस्‍यता राशि को यदि महासभा की सदस्‍यता राशि में जोड दी जावे तो अधिकतम सदस्‍य बन सकेगें। 
  • विनय मेहता कोटा -  युवाओं को सांस्क़ृतिक एवं खेल गतिविधियों से जोड कर राज्‍य एवं जिला तहसील स्‍तर तक आयोजन किये जावे ताकि वे आपस में जुड सके। 

प्रथम सत्र की समाप्ति पर औदीच्‍य बन्‍धु के पितृपुरूष् स्‍व; श्री सुशीलकुमार जी ठाकर सा; को मौन श्रध्‍दांजली अर्पित की गई । 

भोजनोपरान्‍त राजस्‍थान प्रान्‍त की कार्यकारिणी की बैठक सम्‍पन्‍न हुई, जिसमें श्री हेमशंकर जी दीक्षित, अध्‍यक्ष राजस्‍थान प्रान्‍त ने सदन को संबोधित कर महासभा के सदस्‍यता अभियान, सामाजिक आयोजन,जाति संगठन आदि पर अपने विचार प्रगट किये ।
   इसके बाद चित्‍तोडगढ, भीलवाडा, जयपुर, प्रतापगढ, कोटा, बूंदी, झालावाड, बांसवाडा आदि जिलों के अध्‍यक्षों ने अपने जिलों की प्रगति एवं होने वाली कठिनाईयों की जानकारी प्रस्‍तुत की। अन्‍त मे श्री विनोदचन्‍द्र जी व्‍यास, महामंत्री अ;भा औदीच्‍य महासभा ने अपनी कठिनाई बताई।  औदीच्‍य बन्‍धु के प्रत्‍येक अंक में महासभा अध्‍यक्ष महोदय का संदेश छपना चाहिए, तथा महामंत्री का महासभा की गतिविधियों के संबंध में प्रतिवेदन भी छपना चा‍हिए ताकि महासभा  की गतिविधियों की जानकारी मिल सके ।  महासभा के अधिवेशन की अगली बैठक बांसवाडा में रखी जावे। परिचय सम्‍मेलन की तरह सामूहिक यज्ञोपवित आयोजन के लिए भी महासभा की और से सहयोग  राशि दी जाना चाहिए।
         श्री रघुनंदन जी शर्मा ने अपने उदबोधन में कहा कि मैंने सबके सुझाव, समस्‍या और प्रश्‍नों को सुना। आपने सर्वप्रथम औदीच्‍य बन्‍धु के पितृ पुरूष श्री सुशीलकुमार जी ठक्कर द्वारा औदीच्‍य बन्‍धु की सुद्रढता के लिये जीवन भर जो प्रयास किए वे प्रशंसा के योग्य हैं। इस तरह से आपने बन्‍धु को शिशु की तरह पाला और आर्थिक रूप से सशक्‍त बनाया। यह उनका समाज के प्रति समर्पण था। आपने उनके व्‍दारा लिखी गई अंतिम इच्‍छा के बारे में विस्‍तार से बताया। औदीच्‍य बन्‍धु का अगला अंक स्‍व; श्री ठक्कर साहब को समर्पित होगा। अत: उनके संबंध में जिसके पास पुराने फाटोग्राफस, बिताये गये यादगार क्षण,एवं विचार आदि हो तो शीघ्र भेजें ।
पूछे गए प्रश्नो के उत्तर देते हुए कहा की उत्‍तर प्रदेश में समाज के संगठन के बारे में कई माध्‍यमों से खबर भेजी गई किन्‍तु कोई भी आज तक इस कार्य करने के लिए आगे नहीं आया हे। बैंक, को आपरेटिव सोसायटी, शिक्षा संस्‍थान को बनाने के लिए स्‍वयं इकाईयों को प्रयास करना होगा। महासभा उसमें यथायोग्‍य सहयोग कर सकेगी। महिला शिक्षा के बारे में प्रस्‍ताव विचाराधीन है। संजीवनी कोष् के बारे में कहा कि इस कोष् में सहयोग राशि जमा नहीं हो रही है। इसके लिए सभी को प्रयास करना होगा। मेरे पास यदि कोई गंभीर बीमारी से ग्रस्‍त व्‍यक्ति आता है तो मैं उसे शासन से पूरी सुविधा दिलाने में मदद करता हूं। जिन प्रान्‍तीय सरकारों में अन्‍य जाति में विवाह करने पर आर्थिक मदद की जावेगी जैसे आदेश निकाले हैं तो महासभा अपनी और उन्‍हे विरोध पत्र भेजेगी । 
आगे संस्कारो की बात कही की, ब्राहमणत्व के संस्कारों को जीवित रखने की जिम्‍मेदारी जितनी माता बहनों की है उतनी ही पुरूषों की भी है। हर सदस्‍य को धोती अवश्‍य पहनना चाहिए। महासभा का सदस्‍य बनना हमारे संस्‍कारो से जुडा हुआ है। यदिपरिवार जड से जुडा रहेगा तो पुष्पित पल्‍लवित रहेगा । हमें सर्वश्रेष्‍ठ बन कर दिखाना होगा । हर क्षेत्र में प्रतिभाओं को अपना परचम फहराना होगा। माता बहने मेत्रेयी और गार्गी के समान तेजी से आगे बढे । दयानन्द सरस्वती ओर कवि प्रदीपजी के बारे में बता कर औदीच्‍य समाज की  गौरव गाथा की जानकारी दी, ओर कहा की औदीच्‍य समाज में जो विशेष गुण्  है, उन्‍हे आलोकित करना होगा । 
    सभी मंचासीन अतिथियों को स्‍मृति चिन्‍ह प्रदान किये गये। अ;भा; औदीच्‍य महासभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेने के लिए इन्‍दौर से श्री उल्‍हास ठक्‍कर एवं श्री प्रकाश जोशी, देवास से जगदीश शर्मा उज्‍जैन से श्री प्रेमशंकर पण्‍डया, ओमप्रकाश पण्‍डया, शरद त्रिवेदी, सुभाष पण्‍डया, मथुराप्रसाद शर्मा, नन्‍दकिशोर पाण्ड्या, जानकीलाल महिदपुर से भगवतीप्रसाद जोशी, शकरखेडी से श्री बापूलाल जी जोशी, साथ ही राजस्‍थान प्रान्‍त के विभिन्‍न जिलों से औदीच्‍य समाज के प्रतिनिधि एवं सदस्‍य गण उपस्थित हुवे । 

बैठक का संचालन श्री व्रजवल्‍लभ जी शर्मा ने बडी रोचक शैली में करते हुए सदन को बांधे रखा। आभार श्री दामोदर जी शाण्डिल्‍य ने मानते हुवे बैठक समाप्ति की घोषणा की। 
मंच पर पीछे अंकित श्लोक  ''औदीच्‍या: ऋषया सर्वे श्रोत्रिया: शास्‍त्र पारगा। इति लब्‍धा प्रतिष्‍ठा येवयं तेषा कुलोद भव्॥ ने सभी का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित किया। 
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संगीत प्रतिभा कुशल अभिनेत्री ओर नर्तकी सुश्री कणिका पाण्‍डे- औदीच्य समाज गौरव शाली महिलायें।

संगीत प्रवीण ज्ञाति गरिमा सुश्री  कणिका पाण्‍डे
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 संगीत प्रतिभा कुशल अभिनेत्री ओर नर्तकी सुश्री कणिका पाण्‍डे का जन्‍म 12 दिसम्‍बर 1971 को कोटा में सहस्त्रोदीच्य  शिवशंकर जी पाण्‍डे के यहां हुआ। पाण्‍डे जी स्‍वयं शास्‍त्रीय संगीत के गायक एवं प्रसिध्‍द बांसुरी वादक रहे हैं। संस्कारित संगीतमय वातावरण वाले समर्पित परिवार में परिवार में जन्मी  कणिका संगीत की शिक्षा उसके पिता द्वारा कम आयु में ही प्रारम्भ हो गई थी। बचपन से ही घर में होने वाली अनौपचारिक घर संगीत समारोहों में कई दिग्गज कलाकारों को सुनने ओर जानने का अवसर अनायास ही मिलता रहा था। दस वर्ष से कम उम्र में ही आपने संगीत में एक सख्त अनुशासन को स्वीकार कर लिया था। इस प्रकार से कणिका का लालन पालन एक संगीतमय वातावरण में ही हुआ। कणिका के पिता का स्‍थानान्‍तरण सन 1979 में जयपुर के राजस्‍थान संगीत संस्‍थान के संगीत विभागाध्‍यक्ष उपाचार्य पद पर हो जाने के कारण समस्‍त परिवार को जयपुर स्‍थानान्‍तरित हो जाना पडा। कणिक के भविष्‍य के लिए शायद यह अनुकूल ही था। पिता से संगीत में एक ठोस नींव प्राप्त करने के बाद  1995 से वाराणसी  घराने के राजन और साजन मिश्रा, जी से  सूक्ष्म बारीकियों और कला के शैलीगत तकनीक ज्ञान की शिक्षा प्राप्त की। 
यों तो कणिक हायर सेकण्‍डरी स्‍तर तक विज्ञान की छात्र रही, किन्‍तु संगीत एवं नृत्‍य में कणिका की असाधारण् प्रतिभा को परिलक्षित कर इनके पिता ने राजस्‍थान विश्‍वविधायलय में ''बेचलर आफ फाईन आर्टस'' पाठयक्रम में प्रवेश दिला दिया। आठ वर्ष की आयु से ही संगीत एवं नृत्‍य सीखती रहीं, तथा दिनोदिन उन्‍नति की पथ पर अग्रसर होती रही। मास्‍टर आफ आर्टस में सर्वप्रथम आने पर विश्‍व विध्‍यालय ने स्‍वर्ण पदक से सम्‍मानित किया। साथ ही साथ कणिका ने राजस्‍थान संगीत संस्‍थान जयपुर से कंठ संगीत एवं कत्‍थक नृत्‍य में संगीत निपुण की उपाधि प्राप्‍त की । तत्पश्‍चात अखिल भारतीय गांन्धर्व महाविध्‍यालय मंडल बम्‍बई की सर्वोच्‍च परीक्षा 'संगीत झंकार' प्रथम श्रेणी में उत्‍तीर्ण की। देश के कई प्रसिध्‍द संगीत कलाकारों से कणिका के पिता के संबंधों का कणिका को भरपूर लाभ मिला। नं; नारायणराव पटवर्धन, पं; संगमेश्‍वर गुरव, पं; विध्‍याधर व्‍यास जैसे गुणी लोगों का कणिका को मार्गदर्शन मे आपकी प्रतिभा का विकास हुआ। बाद में उच्‍च गायकी की शिक्षा के लिए कणिका ने वाराणसी के प्रसिध्‍द संगीतज्ञ पं; राजन साजन मिश्र से संगीत की प्रायोगिक शिक्षा प्राप्त की।
  कणिका को वर्ष 1990 में महाराणा मेवाड फाउण्‍डेशन की ओर से 'भामाशाह' सम्‍मान से सम्‍मानित किया गया ।  मानव संसाधन नई दिल्‍ली की ओर से कणिका को संगीत एवं नृत्‍य में छात्रव्रतियां प्रदान की गई। राजस्‍थान संगीत नाटक अकादमी की ओर से भी दोनों क्षेत्रों में छात्रवृतियां प्रदान की गई।

संगीत एवं नृत्‍य के अलावा कणिका ने अभिनय के क्षेत्र में भी अनूपम उप‍लब्घि हासिल की है। विश्‍व के प्रसिध्‍द फिल्‍म निर्देशक बर्नार्डो बर्टोलुची की प्रसिध्‍द फिल्‍म '' लिटिला बुध्‍दा''[क्लिक कर देखें] में महारानी महामाया की भूमिका के लिये बर्नार्डो ने कणिका को चुना और कणिका ने इस भूमिका को बहुत खुबसूरती से निभाया। फिल्‍म में कार्य करने के दौरान कणिका ने इंग्‍लैड , नेपाल आदि देशों की यात्रा की।

  अभिनय के अलावा कणिका ने इस फिल्‍म में उस्‍ताद जाकिर हुसैन और प्रसिध्‍द जापानी संगीतम निर्देशक बुरूचि सान्‍कामातो के निर्देशन में अपना स्‍वर देकर अपनी संगीत प्रतिभा का परिचय भी दिया ।
जयपुर के अलावा दिल्‍ली, मुब्‍बई, लुधियाना, इलाहाबाद, रायपुर, पटियाला, मेरठ, मथुरा, कोलकता, एवं कटक इत्‍यादि शहरों में कणिका ने अपने संगीत और नृत्‍य के कार्यक्रम प्रस्तुत किए हैं।
औदीच्‍य समाज की अव्दितीय प्रतिभा कणिक पाण्‍डे ने अपने कुल और समाज को गौरवान्वित किया है। वस्‍तुत कणिक ज्ञाति गरिमा है।
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''मानस माधुरी'' परम पूज्‍या हेमलता जी (दीदी मॉ) -- औदीच्य ब्राह्मण समाज की गोरवशाली महिला।

 परम पूज्‍या हेमलता जी (दीदी मॉ) '' मानस माधुरी''
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संगीतमय रामकथा एवं भागवत प्रवक्‍ता परम पूज्‍या हेमलता जी ''मानस माधुरी'' का जन्‍म 5 अप्रेल 1978 को ग्राम उडाना जिला उज्‍जैन के कृषक परिवार में हुआ। आपके पिताजी श्री ईश्‍वरीप्रसाद जी शर्मा एवं माताजी श्रीमती कलावती शर्मा हैं। 
सिद्धपुर में सम्मान
ज्ञान का दान सर्वोपरि कहा जाता हे, मानस ओर भागवत कथा के माध्यम
 से जन जीवन को जीने की कला सिखाना सुश्री दीदी हेमलता जी
का ध्येय बन गया हे , समाज को आप पर गर्व हे। 
आपने जब जीवन में प्रथम बार बोलना सीखा तो आपके श्री मुख् से स्‍वत: श्री रामायण जी की चौपाईयां ही प्रस्‍फुटित हुई। परिवार में नित्‍य श्री रामायण जी का पाठ एवं आध्‍यात्मिक वातावरण का ही प्रभाव रहा था कि आपको अपनी माताश्री के गर्भ में ही अलौकिक ज्ञान की प्राप्ति हुई। धीरे धीरे आपकी कीर्ति चहूं और फैलने लगी, साथ ही आपने स्‍व प्रेरणा से संगीत के सात सुरों को भी साध लिया हे। आपके इस पावन संकल्‍प में आपका परिवार भी सहयोगी रहा है। 
    कहते हैं जब मन में द्रढ संकल्‍प हो और परमार्थ की राह पर प्रभु भक्ति का उत्‍साह हो, तो लक्ष्‍य स्‍वयं सिध्‍द हो जाता है। आपके जीवन में सन 1990 का वह दिन आया जब अखण्‍ड परमधाम, सप्‍त सरोवर, हरिव्‍दार के महामण्‍डलेश्‍वर युग पुरूष स्‍वामी जी श्री परमानंदगिरी जी ने पवित्र नगरी उज्‍जैन में आपको दीक्षा प्रदान की और आपको शिष्‍या स्‍वीकार किया। बाद में आप मानस माधुरी बनकर महिला शक्ति के लिए एक आदर्श प्रेरणा पुंज बन गई। तब से लेकर आज तक आप समूचे भारतवर्ष में श्री भागवत एवं रामायण जी की ज्ञान अमृत की वर्षा कर रही है । 
   आपने सिध्‍दपुर(गुजरात) में भी ज्ञानामृत की वर्षा की। सिध्‍दपुर औदीच्‍य समाज व्‍दारा भी आपको सम्‍मानित किया गया ।
 आप अपने आश्रम श्री मानस शक्ति पीठ आलमपुर उडाना जिला उज्‍जैन में ही भारत माता मंदिर निर्माण के लिये स्‍वयं से वचनबध्‍द है। साथ ही आप पंचगव्‍य से निर्मित औषधियों के माध्‍यम से एक स्‍वस्‍थ्  एवं सुद्रढ भारत के निर्माण्  के लिए भी क्रत संकल्पित है। श्री उडाना वाले हनुमान जी की क्रपा एवं परमपूज्‍य श्री गुरूदेव का आशीर्वाद आप पर कृपावन्‍त है।
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श्रीमती मालती रावल-- औदीच्य समाज की गोरवशाली महिलाएं ।

सांस्कृतिक अभिरूचि सम्‍पन्‍न- श्रीमती मालती रावल। 
औदीच्‍य समाज में अपनी सांस्कृतिक  रूचि के कारण सम्‍माननीय श्रीमती मालती रावल,‍ ललित कलाविद (नृत्‍य, वाध्‍य, संगीत, चित्रकला आदि में प्रवीण) होने के साथ एक सफल नाटककार, कहानीकार और ललित निबन्ध लेखिका हैं। 
 श्रीमती मालती रावल-बाल कहानियों
के लेखन के माध्‍यम से आप बाल 
मनोविज्ञान सम्‍मत, बाल रूचि को 
जाग्रत करने में सफल रही है।
बाल कहानियों के लेखन के माध्‍यम से आप बाल मनोविज्ञान सम्‍मत, बाल रूचि को जाग्रत करने में सफल रही है। सीधी, सादी, सरल, बोलचाल की भाषा में कही गई कहानियों के व्‍दारा, हिन्‍दी बाल साहित्‍य की श्री वृध्दि की है। 
''भेड चाल'' में सिंह खरगोश आदि वन्‍य जन्‍तुओ पर आधारित कहानीयां है । वहीं ''मीठी बोली'' में साधु एवं मन्‍त्री के बीच हुए संभाषणों से म्रदुभाषी होने के कमाल को बडी सफलता से प्रस्‍थापित किया गया है ''सच्‍ची लगन'' में बालकों के मन पर शिक्षा के महत्‍व की छाप डालने का सुन्‍दर सराहनीय प्रयास हुआ है। लगन का तो अपना महत्‍व है ही, जिससे सब मनोरथ सफल होते हैं। ''नानी कहो'' कहानी में ईसामसीह के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बाल मन की उत्‍कठां को सही दिशा देने का प्रयत्न किया है, जिससे साम्‍प्रदायिक सौमनस्‍य का सहज संवर्धन होता है।
मालती जी की कहानियों में उपदेश मनोरंजरन की चाशनी में लिपटा हुआ है। वह शुष्‍क तथा नीरस रूप में नहीं परोसा जाना ही इनकी विशिष्‍टता है । 
श्रीमती मालती रावल प्रणीत ललित निबन्‍धों में भाव प्रविणता, मौलिक चिन्‍तन, तथा मनोरंजकता है। इनमें विषय, द्रष्टिकोण, और भावाभिव्‍यंजना का अनूठापन है। कोमल ललित भाषा में सामान्‍य विषय को भी असामान्‍य विलक्षणता प्रदान कर देना मालती जी की विशिष्‍ट कला है। 
'' काश हम 'ये'न होकर 'वो' होते" में उर्दू मिश्रित चुटीली भाषा में व्‍यंग्‍य के चटखारे चटूल बने हैं। अर्वाचीन 'काले धन' समानान्‍तर सत्‍ता पर एक करारी चोट है। 
''क्‍या अकेला पन अभिशाप है'' शीर्षेक निबन्‍ध में आरोपित और आत्‍मप्रेरित अकेलेपन का तुलनात्‍मक विवेचन कहीं चिन्‍तन को धार देता है। इस अनिवार्य नियति को बनाने का लेखिका व्‍दारा परामर्श सचमुच गहन गंभीर है।
''अहसास'' कहानी में विकलांग मीना के मानसिक परिताप की झांकी पाठक के मन का झकझोर देती है। '' समाज में नारी की भूमिका'' में प्राच्‍य पाश्‍चात्‍य नारी मुक्ति का गवेषणात्‍मक पर्यावलोकन करते हुए श्रीमती रावल ने भारतीय नारी के सांस्‍क्रतिक ईश्‍वरत्‍व को प्रकट कर अपना सुदक्षिणा रूप सहज ही प्रवर्तित किया है। '' सोचने की बात'' आधुनिक कोटस विधि का सुभाषित संकलन है। अपने में विचारोत्‍तेजक तथा उत्‍सवी स्‍पंदन पूर्ण है।
श्रीमती मालती रावल प्रतिभा सम्‍पन्‍न नाटककार भी है।  जिनके सामाजिक समस्‍याओं से अभिभूत नाटकों में भाषा शैली, पात्र चित्रण, उपयुक्‍त कथोपकथन तथा मंथीयता के सुन्‍दर समीकरण से एक अदभूत लोकोपकारी तथा लोक रंजक तत्‍वों का उदभास्‍वन होता है।
 श्रीमती मालती रावल एक औदीच्‍य गरिमा है।
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  •  डॉ जयाबेन शुक्‍ल से विगत अनेक वर्षो से औदीच्‍य समाज परिचित है। समाज की मुख्‍य पत्रिका औदीच्‍य बन्‍धु के संपादन कार्य से लम्‍बे समय से जुडी रही । इन्‍दौर में औदीच्‍य महिला मण्‍डल की गतिविधियों के संचालन में उनका महत्‍वपूर्ण स्‍थान रहा है, परंतु उनके सेवा भक्ति और त्‍यागमय व्‍यक्तित्‍व के विविध सोपान बहुत कम व्‍यक्ति ही जानते हैं। प्रारम्भिक किशोरावस्‍था में ही ---- ओर अधिक देखें-----------श्रीमती जयाबेन शुक्‍ल - औदीच्य समाज गौरव शाली महिला 
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श्रीमती जयाबेन शुक्‍ल - औदीच्य समाज गौरव शाली महिला।

श्रीमती जयाबेन शुक्‍ल । 
श्रीमती डॉ जयाबेन शुक्‍ल से विगत अनेक वर्षो से औदीच्‍य समाज परिचित है। समाज की मुख्‍य पत्रिका औदीच्‍य बन्‍धु के संपादन कार्य से लम्‍बे समय से जुडी रही । इन्‍दौर में औदीच्‍य महिला मण्‍डल की गतिविधियों के संचालन में उनका महत्‍वपूर्ण स्‍थान रहा है, परंतु उनके सेवा भक्ति और त्‍यागमय व्‍यक्तित्‍व के विविध सोपान बहुत कम व्‍यक्ति ही जानते हैं। प्रारम्भिक किशोरावस्‍था में ही सामान्‍य जीवन के स्‍वर्णिम भविष्‍य पर वज्रपात हो जाने से जीवन अन्‍धकारमय हो गया। वैधव्‍य की दारूण वेदना दुर्लध्‍य पर्वत के समान होने से जीवन का प्रगति पथ्  अवरूध्‍द हो गया । परन्‍तु अपनी सत्‍व शक्ति, पभु पर अटल विश्‍वास और पूज्‍य गुरूवर श्री गोंविदलाल जी शास्‍त्री के कल्‍याणकारी मार्गेदर्शन और स्‍वयं के एकनिष्‍ठ स्‍वाध्‍याय से शिक्षा के उच्च शिखर पर पहुंचने में भगवत कृपा से सफलता प्राप्‍त की। इसके साथ्  ही पूरे परिवार की सेवा में अपने को संलग्‍न कर दिया। पुष्टि मार्ग वल्‍लभ सम्‍प्रदाय के परम्‍परागत संस्‍कार के कारण श्री गोवर्धन नाथ जी की भक्ति के प्रति अविचल निष्‍ठा में अपने को समर्पित कर दिया ।
    आपने अपना शोध प्रबन्‍ध भी म‍हाकवि सूरदास पर वल्‍लभ दर्शन के प्रभाव पर आदरणीय डॉ गोवर्धन नाथ्  जी शुक्‍ल अलीगढ के मार्गदर्शन में लिखा। आपने भागवत ज्ञान कथा यज्ञ का भी भव्‍य आयोजन किया था,  जिससे औदीच्‍य समाज  और अन्‍य वैष्‍णव भक्‍तों का बडा आध्‍यात्मिक उपकार हुआ। 
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श्री नरेश मेहता-- औदीच्य समाज की विभूतियाँ ।

श्री नरेश मेहता
15 फरवरी, 1922  को शाजापुर (मालवा) में जन्म। कहानी, उपन्यास, नाटक और कविता
 के क्षेत्र में समान रूप से रचनाएं। उपन्यास 'यह पथ बंधु था', 'एक समर्पित महिला'
'तथापि' जैसे कहानी-संग्रह, 'सुबह के घंटे' सरीखे नाटक और 'संशय की एक रात' जैसी
 कविता श्री नरेश मेहता के समर्थ रचनाकर्म का प्रमाण हैं। अनेक सम्मान व पुरस्कारों
 में ज्ञानपीठ पुरस्कार भी शामिल।
श्री नरेश मेहता
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श्री नरेश मेहता आत्‍मज पं; बिहारीलाल जी मेहता का जन्‍म 15 फरवरी 1922 को शाजापुर (मालवा) में हुआ था ।  आपने एम;ए;हिन्‍दी काशी विश्‍वविध्‍यालय से किया । 1942 के स्‍वतन्‍त्रता संग्राम में सक्रिय सहयोग दिया । छात्र आन्‍दोलन तथा कांग्रेस कम्‍यूनिस्‍ट पार्टी से लगभग 15 वर्षो तक संबंध्‍द रहे। दिल्‍ली में ट्रेड यूनियन के एक साप्‍ताहिक के संपादन के अलावा ''क्रति'' जैसे प्रमुख मासिक के संपादक रहे। आकाशवाणी के लखनऊ, इलाहाबाद, और नागपुर केन्‍द्रों पर कार्यक्रम अधिकारी रहे। कुछ दिनों तक बौध्‍द भिक्षु से लेकर मिलेट्री में सेकण्‍ड लेप्टिनेंट का अनुभव भी अर्जित किया। इतने विविध अनुभवों के बाद 1959 में साहित्यिक स्रजन और लेखन को अंतिम ध्‍येय मानकर प्रयाग में रहकर स्‍वतन्‍त्र लेखन में रत रहे।
   आधुनिक भारतीय साहित्‍य के शीर्षस्‍थ कवियों, कथाकार एवं विचारक के रूप में न केवल प्रतिष्ठित ही नहीं बल्कि आज के समकालिन लेखन में स्रजनात्‍मक विपुलता, विशिष्‍ठ जीवन द्रष्टि, निष्‍णात भाषा और विशाल फलक को समेटने वाली क्‍लासिकीय शैली के कारण विशिष्‍ठ नाम ही नहीं बल्कि प्रतीक है। अब तक काव्‍य के पांच सग्रह इनमें उत्‍सव संकलन भी है जिसने वर्तमान हिन्‍दी कविता को वैदिकता प्रदान की है । 
    साहित्‍य के क्षेत्र में 1973 में म;प्र; शासन का राजकीय सम्‍मान, 1983 में सारस्‍वत सम्‍मान, 1984 में शिखर सम्‍मान, 1985 में उत्‍तर प्रदेश संस्‍थान सम्‍मान,1990 में भारत भारती सम्‍मान, और 1992 में ज्ञानपीठ पुरस्‍कार प्राप्‍त प्राप्‍त करने वाले श्री नरेश मेहता पा संपूर्ण औदीच्‍य समाज को गर्व है।
    आपकी साहित्यिक क्रतियों में 9 काव्‍य जिनमें 'वन पारवी सुनो' ' बोलने दो भीड को ' और 'अरण्‍या ' आदि मुख्‍य है। 5 खण्‍ड काव्‍य की रचना की है जिनमें महाप्रस्‍थान , प्रवास पर्व , प्रार्थना पुरूष, शबरी आदि मुख्‍य है। 6 उपन्‍यास जिनमें ' यह पथ बन्‍धु था' हिन्‍दी का प्रमूख उपन्‍यासके रूप में मान्‍य हो चुका है, इसकी प्रष्‍ठभूमि  मालवा है,' उज्‍जैन और मालवा की पष्‍ठभूमि पर एक वृहद उपन्‍यास दो भागों में ''उत्‍तर कथा '' के नाम से प्रकाशित हुआ है। धुमकेतु,एक श्रुति,प्रथम फाल्‍गुन आदि मूख्‍य है। तीन कहानी संग्रह है तथा 4 नाटक 'सनोवर के फूल', सुबह के घन्‍टे ,खण्डित यात्रायें आदि मुख्‍य है। इसके अतिरिक्‍त सात आलोचनात्‍मक चिन्‍तन है। आपने वाकदेवी, क्रति तथा दैनिक चौथा संसार का संपादन भी किया । 
   शौक के ना पर पान, सुगन्धित तम्‍बाखु और इत्र, रूचियों में हिमालय यात्रा,संगीत,अध्‍यात्‍म ,तंत्र,ज्‍योतिष और बतरस । पूछने पर सदा अपनी अलिखित पंक्ति सुना देना ' ओ मेरे दाता दी है फकीरी तो देना संकल्‍प भी । श्री मेहता जी ने इस भौतिक संसार से 2 नवम्‍बर 2000 को विदाई ली । साहित्‍य के क्षेत्र में श्री नरेश मेहता का अभूतपूर्व योगदान सदैव स्‍मरणीय रहेगा । आप औदीच्‍य ज्ञाति के उज्‍जवल रत्‍न हैं ! 
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डॉ;चन्‍द्र प्रकाश व्दिवेदी (चाणक्‍य)- औदीच्य समाज की विभूतियाँ ।

     लोकप्रिय धारावाहिक 'चाणक्‍य ' के लेखक निर्देशक तथा अभिनेता औदीच्‍य रत्‍न डॉ; चन्‍द्रप्रकाश व्दिवेदी चिकित्‍सा विज्ञान में एम बी बी एस हैं। परन्‍तु त्‍याग, तप, तितिक्षा, द्दृढ संकल्‍प, सदवृत्ति और देश सेवा के पेतृक संस्‍कारों के साथ गहन सांस्‍कृतिक अध्‍ययन के फलस्‍वरूप चिकित्‍सा क्षेत्र में सेवा करने के स्‍थान पर उन्‍होने अपनी समस्‍त शक्ति आदर्श एवं निस्‍वार्थ राष्ट्र-सेवक चाणक्‍य पर दूरदर्शन धारावाहिक के निर्माण में लगा दी । एतदर्थ उन्‍होने अनेक ग्रन्‍थों का अध्‍यावसाय पूर्वक स्‍वाध्‍याय किया। 
    डॉ; चन्‍द्रप्रकाश को चाण्‍क्‍य पर धारावाहिक निर्माण करने की प्रेरणा प्रसाद जी के चन्‍द्रगुप्‍त नाटक से प्राप्‍त हुई ।
डा; चन्‍द्रप्रकाश के 5 भाई हैं। चाणक्‍य धारावाहिक में जिन प्रकाश व्दिवेदी का नाम आता है, वे उनके ही पाँच भाइयों में से एक हैं। ये धारावाहिक के निर्माता है ।
   आपके पूज्‍य पिता श्री मंछाराम जी ने काशी में 12 वर्ष तक अध्‍ययन कर आचार्य की उपाधि प्राप्‍त की थी। काशी से लोटकर आप सिध्‍दपुर में '' गोपाल सनातन ब्रहमचर्याश्रम'' में अध्‍यापक नियुक्‍त हुए।

    थोडे समय बाद आप बम्‍बई आ गये और वहां गोकुलदास संस्कृत पाठशाला में स्‍थायी रूप से अध्‍यापन करते रहे । गुजरात से राजस्‍थान में आने वाले औदीच्‍य बन्‍धुओं का एक थोक सिरोही एवं उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में बस गया। इनमें स्‍वनाम धन्‍य रायबहादुर गौरीशंकर हीराचन्‍द ओझा,गोकुलभाई भटट एवं भीमशंकर जी व्दिवेदी के नाम एवं जीवन कार्य से हम परिचित हैं । सिरोही से 10 किलोमीटर दूर डोडुआ नामक जागीरदारी ग्राम में आपके पूज्‍य पितामह श्री कृपाराम जी का निवास था। पूर्वज गुजरात सिध्‍दपुर से आने पर प्रथम चन्‍द्रावती में ठहरे और बाद में गोल नामक ग्राम में सिरोही और आसपास लगभग साढे तीन हजार परिवारों का निवास है।
डॉ; चन्‍द्रप्रकाश ने वस्‍तुत बडा साहसिक कदम उठाकर ''चाणक्‍य '' का निर्माण किया है। प्रवाह के विपरीत फिल्मी परंपरा से हटकर सच्‍चाई को सामने लाना अपने आप में महत्‍व का कार्य है। 
''चाणक्‍य '' धारावाहिक में तीन औदीच्‍य बन्‍धु डॉ; चन्‍द्रप्रकाश व्दिवेदी के प्रेरणास्‍त्रोत रहे है।
     पहले उनके पिता श्री आचार्य पण्डित मंछाराम जी।
     दूसरे श्री प्रकाश व्दिवेदी चन्‍द्रप्रकाश जी के पांच सहोदरों में एक है।
    तीसरे उल्‍लेखनीय व्‍यक्ति हैं अलीगढ के डॉ; विश्‍वनाथ शुक्‍ल जिनका राष्ट्र भावनोबोधक गीत ''हम करें राष्ट्र आराधन'' इस धारावाहिक में अपना अर्थ वैशिष्‍टय मधुर स्‍वरों में प्रस्‍थापित करने में सफल रहा है। डॉ; शुक्‍ल हिन्‍दी साहित्‍य के विव्‍दान होने के साथ साथ सक्षम साहित्‍यकार और कुशल कवि हैं। इस गीत को उन्‍होने दिल्‍ली के एक विशाल संघ समारोह में स्‍वयं सस्‍वर गाया भी था । 
औदीच्‍य समाज को आपने गौरवान्वित किया है।
आप परम देशभक्‍त एवं औदीच्‍य-रत्‍न हैं ।
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वेदमूर्ति पंडित नरहरि श्रीक्रष्‍ण शुक्‍ल - औदीच्य समाज की विभूतियाँ।

वेदमूर्ति पंडित नरहरि श्रीक्रष्‍ण शुक्‍ल
   वेदाचार्य प्रकाण्‍ड विव्‍दान '' पण्डित नरहरि श्री कृष्‍ण शुक्‍ल जी का जन्‍म मार्गशीर्ष शुक्‍ल प्रतिपदा संवत 1956 को हुआ। श्री शुक्‍लजी ने 'परोपकाराय संता विभूतय' सिध्‍दान्‍त को अपनाकर आजीवन अपने ग्रह-स्‍थान पर याज्ञवल्‍क्‍य वेदविध्‍या प्रतिष्‍ठान कर ब्राहमणों के बालकों को सम्‍पुर्ण यजुर्वेद, कर्मकाण्‍ड, श्रोतस्‍मार्त, कर्म का अध्‍ययन शिष्‍यपरंपरागत पध्‍दति से करवाया । उनके आशीर्वाद प्राप्‍त पण्डित महेन्‍द्र शास्‍त्री, रमेश पण्‍डया, सोहन भटट, सुरेश पण्‍डया, पं लक्ष्‍मीकान्‍त जी शास्‍त्री, अरूण मेहता, प्रदीप मेहता तथा डा; केदारनाथ शुक्‍ल आदि शिष्यों द्वारा आज भी श्री गुरू सान्‍दीपनी आश्रम श्रीकृष्‍ण अध्‍ययन स्थली अवंतिका की गरिमा को भारत में शुक्‍ल जी के आशीर्वाद से जीवित रखे हुऐ हैं । 
    श्री शुक्ल जी ने आजीवन अवंतिका[उज्जैन]  में रहकर इसी शाला के अंतर्गत सनातन धर्म प्रचारार्थ अनन्‍त श्री विभूषित करपात्री जी महाराज,  आपके गुरू श्री शंकराचार्य जी, कृष्‍णवोधाश्रम जी ,श्री शंकराचार्य निरंजनदेवजी एवं नगर के विव्‍दत परिषद के साथ श्री वैध्‍यरत्‍न रमणलाल जी, वेदशास्‍त्र सम्‍पन्‍न बसन्‍तीलाल जी शुक्‍ल, शंकरदत्‍त जी शास्‍त्री , एवं आयुर्वेदाचार्य वैध्य स्व . लक्ष्‍मीनारायण शुक्‍ल एवं अन्‍य नगर के विव्‍दानों के सहयोग से आजीवन धर्मसंघ संस्‍था का संचालन किया । 
    श्री शुक्‍लजी के जीवन की महान विशेषता यह रही कि उन्‍होने ब्राहमणों को प्रमुख माना । जीवन में ब्राहमणों से ही प्रतिग्रह ग्रहण किया।  जीवनोत्‍तर समय में उन्‍होने औदीच्य समाज उत्‍थान के लिऐ समर्पित होकर समाज को जाग्रत किया और प्रमुख अग्रणी होकर धर्मशाला में श्री गणेश मन्दिर का निर्माण कराया । 
   श्री शुक्‍लजी के विषय में कहा जाता है कि उन्‍होने भूतभावन भगवान महाकालेश्‍वर पर महात्‍मागांधी की अस्थि चढाने पर धर्मशास्‍त्र के आधार पर स्‍वयं अकेले ने आगे आकर विरोध प्रगट किया। आख्रिर अस्थियां वापस गई व महाकालेश्‍वर लिंग पर नहीं चढने दी गई । 
   श्री शुक्‍लजी का विवाह श्रीमान मुन्‍नालाल जी ठक्‍कर उज्‍जैन की सुपुत्री व समाज के प्रतिष्ठित श्री ठाकर ललिताशंकर जी की बहन इन्‍द्रादेवी के साथ हुआ था ।
   श्री शुक्‍लजी का निर्वाण ज्‍येष्‍ठक्रष्‍ण पक्ष पंचमी तदनुसार दिनांक 20 मई 1984 को उज्‍जैन में हुआ। 
समाज की ऐसी प्रेरणादायी विभूति को शत शत नमन । 
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पं गोपीवल्‍लभ जी उपाध्‍याय -औदीच्य समाज की विभूतियाँ ।

audichyamp@gmail.com
                                         पं गोपीवल्‍लभ जी उपाध्‍याय 
         पं; गोपीवल्‍लभ जी उपाध्‍याय पूर्णत गांधीवादी एवं स्‍वदेशी आन्‍दोलन से प्रभावित थे। समाज सेवा के साथ साथ साहित्यिक क्षेत्र में भी आप अग्रणी रहे ।
       1918 से 1964 तक आप 7 मासिक पत्र, 4 साप्‍ताहिक ,एवं 2 दैनिक पत्रों के सहायक रहे। इनमें से हिन्‍द केसरी, चित्रमय जगत पूना, त्‍यागभूमि, नवजीवन, भ्रमर, सुदर्शन, हिन्‍दी स्‍वराज्‍य, अखड भारत, नवराष्‍ट, वीणा आदि प्रमुख पत्र हैं, जिनका संपादन आपने किया। 70 आपने कई [70 से अधिक]  मराठी, गुजराती एवं बंगाली भाषा की पुस्‍तकों का अनुवाद किया। आपके द्वरा लिखे गए 400 से अधिक मौलिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हें।
        वर्षो तक अ; भा; औदीच्‍य महासभा के मुख  पत्र ''औदीच्‍य बंधु '' के सफल संपादक रहे एवं औदीच्‍य बन्‍धु की व्‍यापकता एवं उसे लोकप्रियता के धरातल पर लाने हेतु जीवन के अंतिम चरण तक निष्‍काम भाव से प्रयासशील रहे । 
       पुज्‍य श्रीलालजी साहब की प्रेरणा  एवं प्रयास से जब औदीच्‍य बंधु का प्रकाशन इन्‍दौर से प्रारंभ हुआ तब आपने वर्षो तक संपादक के दायित्‍व का निर्वाह किया ।
   श्री उपाध्‍याय जी सच्‍चे देशभक्‍त और समाजसेवी थे।  16 मार्च 1998 में आगर में जन्‍म लेकर स्‍वाध्‍याय एवं अध्‍यवसाय व्‍दारा अनेक भाषाओं एवं उनके साहित्‍य का गहन अध्‍ययन किया।
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"औदीच्य समाज की विभूतियाँ" "औदीच्य गोरव" के शीर्षक से  हमको जेसे भी नई जानकारी प्राप्त होती हे देने का प्रयत्न करते हें। हम यह भी जानते हें की प्राप्त हुई जानकारी कम हो सकती हे फोटो का अभाव भी हो सकता हे। पाठको से अनुरोध हे की इस श्र्ंखला में ओर भी कई रत्न हें, उनका परिचय फोटो आदि यदि आप उपलब्ध करते हें तो हम आपके सोजन्य से प्रकाशित कर आभारी होंगे। 

पं; गोविन्‍दवल्‍लभ जी शास्‍त्री ---औदीच्‍य समाज की विभूतियां ।

1917 के जलियाँवाला बाग के मंच से घटना के साक्षी श्री पं; गोविन्‍दवल्‍लभ जी शास्‍त्री, औदीच्‍य समाज के वे मूर्धन्‍य विव्‍दान रहे हैं, जिन्‍होने औदीच्‍य संस्‍क्रति को गौरवान्वित किया। वे समाज के उत्‍थान एवं अभ्‍युदय में आजीवन लगे रहे। पूज्‍य श्री लाल जी साहब के अनन्‍य सहयोगी एवं उनके मार्गदर्शन में श्री शास्‍त्रीजी ने समाज की सेवा की है वह चिरस्‍मरणीय है।

शास्‍त्रीजी संस्‍क्रत एवं ज्‍योतिष के प्रकाण्‍ड विव्‍दानि थे।  श्रीमद भागवत पर आपका पूर्ण अधिकार था। वे ऋषि परम्‍परा के प्रतीक यज्ञपुरूष थे । आपके प्रखर व्‍यक्तित्‍व एवं ओजस्‍वी वाणी से सभी मंत्रमुग्‍ध हो जाते थे । वे सदगुरूदेव श्री नित्‍यानंदजी बापजी एवं परम वन्‍दनीय श्री जयनारायण बापजी के विशेष क्रपा पात्र भक्‍त थे। सन 1939 में अपने हरिव्‍दार में प्रणव मंन्दिर की प्रतिष्‍ठा कार्य सम्‍पन्‍न कराया जहां श्री गुरूपाद पदम की , 1 अरब 40 करोड लिखे गये ''ओम'' के उपर स्‍थापना की गई ।1952 में धार में श्री नित्‍यानन्‍देश्‍वर महादेव की प्राण प्रतिष्‍ठा का कार्य सम्‍पन्‍न किया। श्री गुरूदेव के 'श्री नित्‍यानंदे आश्रम पर अनेको महायज्ञ संपन्‍न कराये ।

समाज सेवा के क्षेत्र में भी आप अग्रणी रहे। मथुरा में हुए उत्‍तर भारतीय औदीच्‍य महासभा के अधिवेशन में सक्रिय भाग लिया । 1932 में उज्‍जैन अधिवेशन में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई । इसी प्रकार अ;भा; औदीच्‍य महासभा के जयपुर अधिवेशन, 1951 में बडनगर अधिवेशन, 1954 में देवास अधिवेशन और 1957 में इन्‍दौरे अधिवेशन को सफल बनाने में आपका योगदान प्रमुख रहा । 

1917 जलियांवाला बाग की सभा में भी आप मंच पर थे। राष्‍टपति डा; राजेन्‍दप्रसाद, व्‍ही, व्‍ही गिरी, श्री गोविन्‍दवल्‍लभ पंत एवं श्रीमती सरोजिनी नायडू भी आपकी विव्‍दत्‍ता से प्रभावित थे। 31 जनवरी 1961 में आपका निधन हुआ ।
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